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Showing posts from October, 2022

जल है, तो कल है

  जल है, तो कल है जल संरक्षण पर मैं लिखूं क्या कोई बात जो कहनी कहूँ क्या है नहीं कोई अनभिज्ञ यहाँ है क्षेत्र कोई नहीं बुद्ध जहाँ है सबको कल के जल  का भान रखते हैं मन में वृहद ज्ञान पर अफ़सोस ये मन सकुचाता है कोई चेतना नहीं जगाता है और लोग भी क्या क्या करते हैं सहयोग का मद वो भरते हैं अब दशा हो रही छिन्न भिन्न होने को प्रकट नहीं कोई जिन्न मन से मनुष्य चल अब सम्भाल परिवेश  बिगड़ न बने काल मुझे एकमात्र चिंता खाये जागरण कहां से हम लायें नित दिन बढ़ता ये परदूषण हर रहा धरा का यह भूषण एक तनिक जरा सा कष्ट धरो जल अनायास मत नष्ट करो जब जल ही दुर्दिन लाएगा तब कौन तुम्हें बचाएगा बतलाओ उन्हें जो हैं अनभिज्ञ इस विषय वस्तु पर बनो विज्ञ जल पेय योग्य पर्याप्त नहीं है कहाँ समस्या व्याप्त नहीं तुम चीर व्यवस्था को जानो या विज्ञान से कोई हल छानो नलकूप तालाब हो रहे हैं कम मोटर निकालता जल अखम बहाते लोग  यूं ही शुद्ध पानी जैसे न कोई इनका शानी अरे लापरवाहों शर्म करो और विवेक लगाओ धर्म करो जब जल ही नहीं बचाओगे अनुजों को मुँह कैसे दिखाओगे अब समय यही है जागो तुम एकमात्र राग अलापो   तुम अ...

भू-जल बढ़ाओ, जीवन बचाओ

  भू-जल बढ़ाओ, जीवन बचाओ मनुज आज का दीन हुआ , भू-जल से बिल्कुल हीन हुआ , निशदिन ये व्यथा मुझे खाती है, दूरदृष्टिता क्यों नहीं आती है साधु कहे संत कहे ,कहते कहते वो मरे, सीधी बात घुसे न मन में, कि वृक्ष लगाओ हरे भरे, कहत कबीर सुनो भई साधो इक दिन ऐसा आएगा , जो न बचाया भूजल को तो तड़प तड़प मर जायेगा मानसून पर निर्भर भारत जल के बिना ये जर्जर भारत प्रकृति से ना करो शरारत वृक्ष लगाओ ,जल को बचाओ इसमें हासिल करो महारत गर ऐसा कर पाओगे , खुशहाली तुम लाओगे नहर तालाब कूएँ बनाकर भू-जल को जो बढ़ाओगे प्रकृति के वरदान को पाकर परम मुक्त हो जाओगे कृषक समाज अब दंग है ओद्योगिकता का चढ़ता रंग है ऊँची-ऊंची महल अटारी लगती तुमको जान से प्यारी काट-काट पेड़ों को सारे धरती सूनी मत कर प्यारे जिस दिन पानी उड़ जाएगा क्या पैसों से प्यास भुझायेगा हीरों से भूख नहीँ मिटती जंगल को यूं मत काटो तुम होगा छुपा खज़ाना लाखों का इस भ्रम में मत रहना तुम लूट-लूट कर खूब खज़ाना जब पूरी तरह थक जाओगे पानी नहीं बचा होगा तब सोचो! कैसे प्यास बुझाओगे हे! मेरे प्यारे भारत, भीड़ का हिस्सा मत बनो देख देख कर दूजों को पागलपन को मत चुनो धीर बनो और ...

जय जवान

  जय जवान रण क्षेत्र अगर ये ज़िस्म बने मैं  रक्षक इसका वस्त्र बनूँ मैं ढाल बनूँ मैं अस्त्र बनूँ मैं महादेव का शस्त्र बनूँ दुश्मन के ऊपर ग़ज़्र बनूं फौलाद बनूँ मैं वज़्र बनूँ मैं करूँ अरिदल का महाविनाश जीवन को तड़पे उसकी हर एक सांस वो महाप्रलय की बेला हो मेरा अरिवक्ष पर खेला हो मैं रक्त से होली खेलूँगा हर वार को हंस कर झेलूंगा उसकी मौत भी अब चिल्लाएगी पर मौत न उसको आएगी वो सोच के ही थर्राएगा जब जब विचार ये आएगा गर आंख दिखाना चाहेगा वो महा विनाश बुलायेगा  जब मांगेगा वो दया भीख वह जाएगा एक बात सीख यदि मानचित्र पर दिखना है भारत से दूर ही टिकना है -/-आशीष कुमार रंजन ://hamaarikahaniyhttpsan.blogspot.com/2022/10/blog-post_34.html

अस्वभाविक जीवन

अस्वभाविक जीवन   जिस प्रसंग में आज हम बात करने जा रहे हैं उस परिप्रेक्ष्य में मानव जाति से उदाहरण प्रस्तुत करना ज्यादा उचित होगा । स्त्री और पुरुष के समागम के महत्वपूर्ण क्षणों में पुरुष का शुक्राणु स्त्री के अंडाशयों को भेदते हुए निषेचन की प्रक्रिया को अंजाम देता है। इन  दो अलग अलग कोशिकाओं के अद्भुत संलयन के समय में वह आहिस्ते से  प्रवेश कर जाती है, हम इसे सुविधानुसार जीवात्मा कह सकते हैं या प्राण , दोनों ही उचित है। प्रयोगों से समझ आता है कि यह जीवात्मा बहुत ही सूक्ष्म है, शायद ऊर्जा का ही एक रूप  है। यह जीवात्मा ही कोशिकाओं को विकसित होने के लिए बाध्य करती है अन्यथा कोशिकायें मर जातीं और बच्चे का जन्म असफल हो जाता । समय के अनुसार कोशिकाओं का मिश्रण बच्चे के लिंग का निर्धारण करता है। धीरे-धीरे गर्भ का काल पूरा होता है और बच्चे का जन्म होता है। हम कई जगहों पर जीवात्मा को चेतना शब्द से संबोधित करेंगे अतः दोनों शब्दों को समान अर्थों में लेना बोधपरक होगा। शरीर के अंदर बैठी चेतना शरीर को दो जरूरतों से भर देती है; एक सुरक्षा , दूसरी भूख । भूख भी एक तरह की सुरक्षा ही है ...

काशी और गंगा

  काशी और गंगा घाटों से टकरा कर गंगा, मानो पत्थर को जगा रही हो , बात गूढ़  कुछ है ही ऐसी , बार-बार वो बता रही हो ।(1) चली जटा से शंकर के वो, धूल-भूल को हटा रही हो, लेकर व्रत वो अविरत बहती, अखिल पाप को मिटा रही हो।(2) काल भाल पर कल-कल करती, हिमखंडों गर्तों में पलती, चली धरा में स्वतः मस्त हो, शनैः शनैः  अतितीव्र वो चलती ।(3) हर जंतु को हर-हर कहती, देश, वनों को,घर-घर, कहती, इकतारा के धुन को सुनाकर, ध्यान मगन वो सबको करती।(4) स्थिर जीवों को चंचल करती, बन्जर को वो कंचन करती, खुद ही मंच सजाकर के वो , विविध पात्र का मन्चन करती,(5) बूदें बनकर  अम्बुद गिरता, धारा की लहरों पर फिरता , अहोभाग्य है उस वारिद का, खुद विलीन हो ,पावन करता।(6) काशी में शिव-शक्ति बसकर, चिर संस्कृति में इसको कसकर, दक्षिण से उत्तर में बहकर, जय भागीरथ , गंगा रहती।(7) सरिता की धारा में मिलकर, तारतम्य में कौन बहेगा , गर, शिव का नाद नहीं होगा ! ब्रह्माण्ड समूचा मौन रहेगा।(8) शम्भू के त्रिशूल पे टिककर , भार पाप का कौन सहेगा, तपोस्थली ऋषियों-संतो की , काशी से बढ़कर कौन वहेगा?(9) अखिल अखण्डा वो ही सत्य है, शेष ब...