तेरा बंधन
ऐसे ही बैठे हुए थे, एक दिन हम शाम को
कर रहे थे स्मरण, हम भी तुम्हारे नाम को ।(1)
कितने शायर हैं बनाये, इस तुम्हारे रूप ने
कितने सपने हैं जलाये, चाहतों की धूप ने।(2)
घर सदा हमने बनाया था, मनस की रेत पर
था परन्तु कुछ लिखा, इस नियति की बेंत पर।(3)
क्या प्रयोजन ले चले थे, करना था किस काम को
थे यही सब सोचते, हाथों में लेकर जाम को।(4)
थे निरा कितने अकिंचन, रास्तों की टोह में
जिनको तुमने बांध रक्खा था, समय के मोह में।(5)
सब्र आखिर कौन इतना ,तुमको पाने की करे
या रहे जिंदा यहाँ पर , याकि जीते जी मरे।(6)
क्यूँ रखा है तुमने मेरे, मन को इतना कैद कर
या मेरा इलाज कर तू , या मुझे ही वैद्य कर ।(7)
अब तेरा ये पाश, मेरी जान लेने पर तुला है
यूँ किसी की जान लेकर, कब किसी को क्या मिला है।
खोल मेरी बेड़ियां, मुझको अभी आजाद कर
है यदि कुछ काज कोई, उसको इसके बाद कर।(9)
क्या पहुँचती है, मेरी आवाज तुम तक नहीं
छोड़कर मुझको गयी थी,मैं अभी भी हूँ वहीं।(10)
जिस कदर छीना था, तुमने हमारे चैन को
जागती तुम भी फिरोगी, बेचैनियों में रैन को।(11)
रंग का वैभव तभी तक है, जनों की नेह में
रौशनी पड़ती रहे, जब तक तुम्हारी देह में।(12)
जब जरा तुमको धरेगा, सोचती तुम भी फिरोगी
क्यों किया बेचैन मुझको, सोचते घुट-घुट मरोगी।(13)
लोभ में जितनों को पकड़ा, आया न कोई काम को
फिर वहीं तुम भी करोगी, याद मेरे नाम को ।(14)
-/-आशीष कुमार रंजन
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