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भू-जल बढ़ाओ, जीवन बचाओ

 भू-जल बढ़ाओ, जीवन बचाओ




मनुज आज का दीन हुआ ,

भू-जल से बिल्कुल हीन हुआ ,


निशदिन ये व्यथा मुझे खाती है,

दूरदृष्टिता क्यों नहीं आती है

साधु कहे संत कहे ,कहते कहते वो मरे,

सीधी बात घुसे न मन में,

कि वृक्ष लगाओ हरे भरे,


कहत कबीर सुनो भई साधो

इक दिन ऐसा आएगा ,

जो न बचाया भूजल को

तो तड़प तड़प मर जायेगा


मानसून पर निर्भर भारत

जल के बिना ये जर्जर भारत

प्रकृति से ना करो शरारत

वृक्ष लगाओ ,जल को बचाओ

इसमें हासिल करो महारत


गर ऐसा कर पाओगे ,

खुशहाली तुम लाओगे

नहर तालाब कूएँ बनाकर

भू-जल को जो बढ़ाओगे

प्रकृति के वरदान को पाकर

परम मुक्त हो जाओगे


कृषक समाज अब दंग है

ओद्योगिकता का चढ़ता रंग है

ऊँची-ऊंची महल अटारी

लगती तुमको जान से प्यारी

काट-काट पेड़ों को सारे

धरती सूनी मत कर प्यारे


जिस दिन पानी उड़ जाएगा

क्या पैसों से प्यास भुझायेगा

हीरों से भूख नहीँ मिटती

जंगल को यूं मत काटो तुम

होगा छुपा खज़ाना लाखों का

इस भ्रम में मत रहना तुम


लूट-लूट कर खूब खज़ाना

जब पूरी तरह थक जाओगे

पानी नहीं बचा होगा तब

सोचो! कैसे प्यास बुझाओगे


हे! मेरे प्यारे भारत,

भीड़ का हिस्सा मत बनो

देख देख कर दूजों को

पागलपन को मत चुनो

धीर बनो और वीर बनो ,

इतनी सी मेरी बात सुनो


वैदिक इतिहास हमारा ,

इतना विकसित क्यों था

क्योंकि मूल हमारा ,

प्रकृति संरक्षण पर टिका था

इतनी बात मुझे कहनी थी ,

इतनी ही तुमको सुननी थी

खुद भी जागो और जगाओ ,

जल बचाओ जीवन बचाओ

भू-जल का स्तर बढ़ाओ



-/-आशीष कुमार रंजन



https://hamaarikahaniyan.blogspot.com/2022/10/blog-post_10.html


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