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अस्वभाविक जीवन

अस्वभाविक जीवन 

जिस प्रसंग में आज हम बात करने जा रहे हैं उस परिप्रेक्ष्य में मानव जाति से उदाहरण प्रस्तुत करना ज्यादा उचित होगा । स्त्री और पुरुष के समागम के महत्वपूर्ण क्षणों में पुरुष का शुक्राणु स्त्री के अंडाशयों को भेदते हुए निषेचन की प्रक्रिया को अंजाम देता है। इन  दो अलग अलग कोशिकाओं के अद्भुत संलयन के समय में वह आहिस्ते से  प्रवेश कर जाती है, हम इसे सुविधानुसार जीवात्मा कह सकते हैं या प्राण , दोनों ही उचित है। प्रयोगों से समझ आता है कि यह जीवात्मा बहुत ही सूक्ष्म है, शायद ऊर्जा का ही एक रूप  है।

यह जीवात्मा ही कोशिकाओं को विकसित होने के लिए बाध्य करती है अन्यथा कोशिकायें मर जातीं और बच्चे का जन्म असफल हो जाता । समय के अनुसार कोशिकाओं का मिश्रण बच्चे के लिंग का निर्धारण करता है। धीरे-धीरे गर्भ का काल पूरा होता है और बच्चे का जन्म होता है। हम कई जगहों पर जीवात्मा को चेतना शब्द से संबोधित करेंगे अतः दोनों शब्दों को समान अर्थों में लेना बोधपरक होगा।

शरीर के अंदर बैठी चेतना शरीर को दो जरूरतों से भर देती है; एक सुरक्षा , दूसरी भूख । भूख भी एक तरह की सुरक्षा ही है और दोनों आवश्यकताएं माँ का आँचल पूरा कर देता है। एक वह तब रोयेगा जब उसे भूख लगी हो, और दूसरा जबकि वह वातावरणीय रूप से असहज हो ।

उसे भाषा का ज्ञान नहीं होता ,बल्कि रो कर या मुस्कुराकर अपने भाव प्रकट करता है। वह अभी तक समाज की विभिन्न विचारधाराओं से अछूता होता है , वह सफलता और असफलता जैसी बातों से मुक्त होता है । उसका दिमाग भी इतना कुछ नहीं सोचता । वह बच्चा तनाव(depression) , अत्याधिक मानसिक विचारशीलता (over thinking), और भविष्य की अनिश्चितता (future insecurity) के प्रभाव से कोशों दूर होता है।

चेतना व्यक्ति को परेशान नहीं करती बल्कि यह तो हमको हमारे मूल स्वभाव के करीब लाती है। वहीं हमारी कुत्सित सामाजिक व्यवस्था है, जो लोगों को रोगी बनाती है

यह बच्चा अभी तक वर्तमान में प्रतिष्ठित है, इसको न ही अगले क्षण की चिंता है और न ही कल की ।

यदि इसका वर्तमान सुंदर है तो यह आनंद में रहेगा । वर्तमान में दु:ख है तो रोयेगा, दुःखी होगा और चाहेगा कि इससे दूर हो सके। यह जीवन और जीवंतता के काफी करीब होता है या यह कहें कि दूर नहीं होता । मगर जैसे जैसे उसकी उम्र बढ़ती है, वह समाज की कई अवधारणाओं को अपने अंदर ग्रहण करता जाता है ,     वैसे-वैसे जीवन से दूर होता जाता है और दुख के करीब।

तरह तरह की जीवनशैली, परिवार , विचार व समाज के प्रभावी लोगों का असर बच्चे के मन को रूप देता जाता है।

महत्वकांक्षा ने मनुष्यों को जितना सुखी किया है, उससे कहीं ज्यादा दुःख दिया है। महत्वाकांक्षा को और करीब से देखा जाए तो यह स्पष्ट होता है कि जब यह सिर्फ और सिर्फ अपने हित को समेटे हुए होती है तो ज्यादा विनाश करती है और यह विनाश मानवों के दुःख का भी कारण बनता है,  इसके उलट जब यह आस पास के पर्यावरण के हित को ध्यान में रखती है तो उन्नति होती है, सुख तथा सौहार्द का परिवेश जन्म लेता है।  

-/-आशीष कुमार रंजन   


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