जल है, तो कल है
जल संरक्षण पर मैं लिखूं क्या
कोई बात जो कहनी कहूँ क्या
है नहीं कोई अनभिज्ञ यहाँ
है क्षेत्र कोई नहीं बुद्ध जहाँ
है सबको कल के जल का भान
रखते हैं मन में वृहद ज्ञान
पर अफ़सोस ये मन सकुचाता है
कोई चेतना नहीं जगाता है
और लोग भी क्या क्या करते हैं
सहयोग का मद वो भरते हैं
अब दशा हो रही छिन्न भिन्न
होने को प्रकट नहीं कोई जिन्न
मन से मनुष्य चल अब सम्भाल
परिवेश बिगड़ न बने काल
मुझे एकमात्र चिंता खाये
जागरण कहां से हम लायें
नित दिन बढ़ता ये परदूषण
हर रहा धरा का यह भूषण
एक तनिक जरा सा कष्ट धरो
जल अनायास मत नष्ट करो
जब जल ही दुर्दिन लाएगा
तब कौन तुम्हें बचाएगा
बतलाओ उन्हें जो हैं अनभिज्ञ
इस विषय वस्तु पर बनो विज्ञ
जल पेय योग्य पर्याप्त नहीं
है कहाँ समस्या व्याप्त नहीं
तुम चीर व्यवस्था को जानो
या विज्ञान से कोई हल छानो
नलकूप तालाब हो रहे हैं कम
मोटर निकालता जल अखम
बहाते लोग यूं ही शुद्ध पानी
जैसे न कोई इनका शानी
अरे लापरवाहों शर्म करो
और विवेक लगाओ धर्म करो
जब जल ही नहीं बचाओगे
अनुजों को मुँह कैसे दिखाओगे
अब समय यही है जागो तुम
एकमात्र राग अलापो तुम
अन्यथा हो रही देर यहाँ
मिट जाएगा एक दिन ये जहां
मिट जाएगा एक दिन ये जहां ।।

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